Saturday, 29 September 2012

ग़णेशोत्सव पर कवि सम्मेलन सम्पन्न


प्रति वर्ष की भांति इस वर्ष भी गणेशोत्सव के दौरान राजधानी दिल्ली के द्वारका उपनगर में कवि सम्मेलन आयोजित  किया गया.

 

महाराष्ट्र मित्र मंडल के तत्वावधान में आयोजित इस कवि सम्मेलन का सफल संचालन लब्ध्प्रतिष्ठ कवियित्री डा. कीर्ति काले ने किया. क़वि सम्मेलन के मुख्य अतिथि पूर्व सी बी आई निदेशक श्री जोगिन्दर सिंह थे व विशिष्ट अतिथि विधायक करण सिंह तंवर  थे.



कवि सम्मेलन का प्रारम्भ कीर्ति काले की सरस्वती वन्दना के साथ हुआ. इसके बाद ओज के कवि रमेश गंगेले अनंत जी ने वर्तमान राजनैतिक व्यवस्था पर चुटीले काव्यात्मक प्रहार किये.उन्होने संसद ठप्प होने पर प्रश्न उठाते हुए नेताओं की भी खबर ली. तदुपरांत डा.अरविन्द चतुर्वेदी ने अपनी हास्य गज़ल के साथ ताज़ा रूमानी गज़लों के सस्वर पाठ से श्रोताओं की वाह वाही लूटी.



अलवर से पधारे ब्रज भाषा के सशक्त हस्ताक्षर डा. रमेश बांसुरी ने अपनी  ब्रज भाषा के छंदों के साथ साथ अपनी प्रसिद्ध रचना “सोने की होती तो का करती ,अभिमान करै देखो बांस की जाई” सुनाकर उपस्थित समुदाय का दिल जीत लिया.

हास्य-व्यंग्य  के प्रसिद्ध कवि भोपाल से पधारे उमेश उपध्याय जी ने हास्य रचनाओं के साथ अपनी प्रतिनिधि रचना “ शास्त्रीय संगीत सम्मेलन उर्फ बाजू-बन्ध खुल खुल जाय”  प्रस्तुत की.

 

इसके बाद कवि सम्मेलन में समां बान्धने हेतु डा. कीर्ति काले ने जिम्मेदारी सम्भाली तथा मधुर गीतों की बौछार से आमंत्रित जनता को रसाविभोर कर दिया. उनकी रचनायें –‘ ऐसा सम्बन्ध जिया मैने,जिसमें कोई अनुबन्ध नहीं” तथा  ‘ फिर हृदय के एक कोने से कोई कुछ बोल जाता है” बहुत सराही गयी.

 

अंत में जयपुर से आये वरिष्ठ कवि सुरेन्द्र दुबे ने एक के बाद एक हास्य व्यंग्य की रचनाओं से मध्य रात्रि तक श्रोताओं को  बान्धे रखा.

 

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Friday, 25 May 2012


महंगौ है गऔ तेल  

फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो  अब नांय बैठौंगो , कार में अब नांय बैठौंगो फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगौ.

·         तेल कौ पैसा मोपे नांय,  अब हमें कौउ पूछत नांय, कार अब हमें सुहावत नांय                 देख देख कें कुढ़ों  जाय में कैंसे बैठौंगो ?

·फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो



·         संग मेरे ठाड़ी गूजरिया, पहन के धानी चूनरिया, के पिक्चर ले चल सांवरिया

·पैदल कैंसे जांऊ मैं पिक्चर  घर ई बैठौंगो,                                             फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो                                                                                                                     

·         चीख रये सब टीवी अखबार, बढ़ गयी महंगाई दस बार, जे गूंगी बेहरी है सरकार             जनता बिल्कुल्ल है लाचार, देश में मच गऔ हाहाकार                                     दफ्तर मेरो दूर मैं, रस्ता कैसे पाटौंगौ ?

·फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो



·          कि नेता मज़े करें दिन रात , विन्हे महंगाई नांय सतात, कीमतें फिर फिर हैं बढ़ जात,        अबकी बारी सोच लयौ है वोट ना डारोंगौ  

फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो  अब नांय बैठौंगो,कार में अब नांय बैठौंगो  फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगौ.















Tuesday, 14 February 2012

डा. स्वामी का जयपुर में भाषण

Feb 12, 2012 डॉ स्वामी बताते हैं की संस्कृति ही सामाजिक रचना का आधार है एवं भारतवर्ष की संस्कृति सबसे पुराचन, श्रेष्ठ एवं सिद्ध है । इसे सनातन धर्म भी कहते हैं । ८ सदियों के इस्लामिक एवं २ सदियों के ईसाई राज के होते हुए भी सनातनी संघर्ष करते रहे , तभी आज भारत में ८३ % सनातनी हैं । डॉ स्वामी देश के सनातनी, वीर पुत्रियों एवं पुत्रों के बारे में बताते हैं । उन्होंने देश के गौरवपूर्ण संस्कृति का एक व्याख्यान दिया ।

उन्होंने कहा की यदि भारत का विलुप्त मान इस विश्व में वापस लाना है तो सनातन धर्म को पुनर्जीवित करना पड़ेगा । इस देश में धर्म -निरपेक्षता ने हिन्दुओं के साथ पक्षपात मात्र किया है । यह हिन्दू संस्कृति ही भारत की पहचान है । डॉ स्वामी आरक्षण के विषय पे भी चर्चा करते हैं एवं बताते हैं की तुष्टिकरण की नीति ने इस व्यवस्था को विकृत कर दिया है । देश की बाकी समस्याओं पे चर्चा करते हुए डॉ स्वामी ने कश्मीर की बात की । आगे वो राम मंदिर की समस्या का भी हल सुझाते हैं ।डॉ स्वामी के पास देश के भविष्य को ले कर एक उत्तम दृष्टीकोण है जो देश के पुनरुत्थान के लिए आवश्यक है । व्याख्यान ख़त्म करते हुए उन्होंने २-जी के विषय पे भी व्यंग्य किया ।
http://www.youtube.com/watch?v=2E0u-_jAQUU

Tuesday, 3 January 2012

नया वर्ष शुभ हो

हैप्पी न्यू ईयर 2012

नाचो गाओ मौज़ मनाओ हैप्पी न्यू ईयर
नया वर्ष है खुशी मनाओ हैप्पी न्यू ईयर

प्यार से सबको गले लगाओ हैप्पी न्यू ईयर
जो रूठा है उसे मनाओ हैप्पी न्यू ईयर

महंगा है पेट्रोल तो उसकी चिंता भी छोड़ो
पैदल पैदल ओफिस आओ हैप्पी न्यू ईयर

जो दफ्तर में काम है ज्यादा पूरा उसे करो
ओवर टाइम भूल भी जाओ हैप्पी न्यू ईयर

लोकपाल की चिंता तुम क्यों करते हो अन्ना
अनशन छोड़ो,जम कर खाओ हैप्पी न्यू ईयर

लड्डू पेड़ा महंगा, महंगी चौकलेट भी है
आधा आधा मिलकर खाओ हैप्पी न्यू ईयर

( रचयिता: डा. अरविन्द चतुर्वेदी)

Thursday, 22 September 2011

महंगौ है गयौ तेल ( ब्रज भाषा का गीत)

फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो
अब नांय बैठौंगो , कार में अब नांय बैठौंगो
फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगौ.


तेल कौ पैसा मोपे नांय,
अब हमें कौउ पूछत नांय,
कार अब हमें सुहावत नांय
देख देख कें कुढ़ों जाय में कैंसे बैठौंगो ?
फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो




संग मेरे ठाड़ी गूजरिया,
पहन के धानी चूनरिया,
के पिक्चर ले चल सांवरिया
पैदल कैंसे जांऊ मैं पिक्चर घर ई बैठौंगो,
फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो

चीख रये सब टीवी अखबार,
बढ़ गयी महंगाई दस बार,
जे गूंगी बेहरी है सरकार
जनता बिल्कुल्ल है लाचार,
देश में मच गऔ हाहाकार
दफ्तर मेरो दूर, मैं रस्ता कैसे पाटौंगौ ?
फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो



कि नेता मज़े करें दिन रात ,
विन्हे महंगाई नांय सतात,
कीमतें फिर फिर हैं बढ़ जात,
अबकी बारी सोच लयौ है वोट ना डारोंगौ
फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगो


अब नांय बैठौंगो,कार में अब नांय बैठौंगो
फिर तें महंगौ है गऔ तेल, कार में अब नांय बैठौंगौ

डा. अरविन्द चतुर्वेदी

Friday, 18 March 2011

मजे लो होली में

नाचो दे दे ताल, मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.

रंग बिरंगे चेहरों में ढून्ढो धन्नो,
घर हो या ससुराल , मजे लो होली में.

हुश्न एक के चार नज़र आयें देखो,
एनक करे कमाल , मजे लो होली में


चढे भंग की गोली ,डगमग पैर चलें,
बहकी बहकी चाल, मजे लो होली में.

ऐश्वर्या जब तुम्हे पुकारे ‘अंकल जी’,
छूकर देखो गाल, मजे लो होली में


छेडछाड में पिट सकते हो ,भैया जी,
गैंडे जैसी खाल, मजे लो होली में.



बीबी बोले मेरे संग खेलो होली,
बैठो सड्डे नाल , मजे लो होली में.

Saturday, 4 September 2010

कृष्ण जन्माष्ठमी पर विशेष छन्द



मोर के पखुअन कौ माथे पै मुकुट धारि
सांवली सलौनी छवि श्याम की सुहावती
आवती-औ-जावती मधु बन छावती
पल-पल प्रीत बन सांसन में धावती
मंद-मंद मुरली की तान सुनि भारती
आरती कान्हाजी की भारती उतारती

आरती उतारती रागिनी उचारती
मथुरा में जमुनाजी चरण पखारती
कर्म ही सुकर्म है यह सिद्ध करने के लिए
धर्म की सुरक्षा हेतु बने कृष्ण सारथी
आततायी उग्रवादी दानवों के वध हेतु
देवभूमि आज फिर कृष्ण को पुकारती।



पंडित सुरेश नीरव


( चित्र व रचना -साभार : जय लोक मंगल ब्लोग )

Friday, 11 December 2009

यू.पी के करौ चार हिस्सा, हमें देउ हमारौ बृज प्रदेश,

अब सुनौ लल्ला सौ की सूधी एक बात. तुम्हाई सुन लई भौत. अब तुम्हें सुनने परैगी हम्हाई. तुम तेलंगाना मांगौ चायें मांगौ गोरखा लैंड. हमाई बला सें. हमें जामें कछू बुराई नायं लगत. लेकिन अब हमें चूना मती लगाउ.

जब तुम सबै सब कछू बांट रये हो, तुम हम ने कौन सी तुम्हाई भैन्स खोल रखी है. का हमें नायं देउगे हमाउ हिस्सा?
का कही ? हमें का चईयें ?अरे लल्ला हमें चईयें हमाऔ बृज प्रदेश .

अब और सुनौ कि हमें कैसौ बृज प्रदेश चईयें. हमारौ जो बृज प्रदेश है वू खाली यू.पी सौं नायं निकरैगौ.
हमाये बृज प्रदेश मे यू.पी से आवेंगे आगरा,मथुरा,फिरोज़ाबाद,शिकोहाबाद,इटावा,मैनपुरी,कन्नौज,फरुखाबाद, एटा, अलीगढ़्,बुलन्दशहर के ग्यारै ज़िले, संग में आएगौ राजस्थान कौ भरतपुर ,मध्य प्रदेश के भिंड, मोरेना,ग्वालियर ज़िले. सब मिलाय कैं बनेंगे पन्द्रह ज़िले.

और सुन लेउ, जी हरित -फरित प्रदेश का बला है? का मतलब है हरित -फरित प्रदेश कौ ? हमाई संस्कृति ,हमाई सभ्यता, हमाई बोल-चाल ,हमाये संस्कार्, हमाऔ खान-पान सब तो अलग है पच्छिम यू.पी सें. हमें नायं मतलब काऊ हरित-फरित प्रदेश की मांग सें, हमें तौ अलग्गई चईयें हमाऔ बृज प्रदेश.

राधे-राधे. अब तौ लै कैंई रहेंगे. कछू करकें देख लियो.
बोलो वृन्दावन बिहारी लाल की --जै.

Sunday, 27 September 2009

हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार प्रसार प्रगति में ब्लोगवाणी की भूमिका अद्वितीय है , आइये मैथिली जी व सिरिल जी को हम सब मनायें

हिन्दी चिट्ठाकारी के प्रचार ,प्रसार व प्रगति में ब्लोगवाणी की भूमिका अद्वितीय है. मैने दो सिर्फ दो वर्ष पहले ही (हिन्दी) ब्लोगिंग शुरू की थी और इन दो वर्षों में मैने हिन्दी चिट्ठाकारी ( ब्लोगिंग) का निरंतर विकास देखा है. सिर्फ इसमें ब्लोगरों की संख्या ही कई गुनी नहीं बल्कि तकनीक में भी ज़ोररदार सुधार हुआ है. अक्षरग्राम, नारद ,चिट्ठाजगत व ब्लोगवाणी ,इन चारों ने जो काम किया उसे कम करके नहीं आंका जा सकता. आज जो सर्वाधिक प्रयोग होने वाले दो एग्ग्रीगेटर हैं उनमें ब्लोगवाणी व चिट्ठाजगत ही हैं. मेरे पास आंकडे नहीं है लेकिन मेरा अन्दाज़ है कि ब्लोगवाणी अधिक लोकप्रिय है.दो वर्ष पहले मैने अपने ब्लोग पर सर्वेक्षण किया था ,तब 49% लोगों ने बताया था कि वह सिर्फ ब्लोगवाणी का ही प्रयोग करते है( देखें पूरी रपट )

मुझे याद है कि संतनगर ,ईस्ट ओफ कैलाश ,नई दिल्ली में लगभग दो वर्ष पहले एक ब्लोग्गर मीट हुई थी ( जो मेरे विचार से अब तक हुई सबसे महत्वपूर्ण हिन्दी ब्लोगर मीट थी) . वह ब्लोगवाणी के कार्यालय में हुई थी ( हालां कि इसका आयोजन तो कनाट प्लेस में था परंतु भीड़ बढने से स्थान परिवर्तित हुआ था). उस मीटिंग में भी ( दूसरे सन्दर्भ में)एग्ग्रीगेटर की भूमिका पर एक सार्थक बहस हुई थी. उस बैठक में -अफलातून, मसिजीवी, संजय बेंगाणी, नीलिमा, मैथिली शरण,घुघूति बासूति, पंगेबाज ( अरुन अरोरा),आलोक पुराणिक,शैलेश भारतवासी,सुनीता चोटिया, सृजनशिल्पी,काकेश,मोहिन्दर कुमार, नीरज, सुरेश यादव, जगदीश भाटिया ,(कई नाम भूल रहा हूं) जैसे प्रमुख चिट्ठाकार मौज़ूद थे. ( देखें मेरी एक रपट ) हालां कि उस समय भी हिन्दी चिट्ठाकारी ( ब्लोगिंग) को लेकर ऐसे ही प्रश्न थे जो नारद /अक्षरग्राम /ब्लोगवाणी को लेकर उठे थे. उस समय बाज़ारवाद जैसे मुहावरे भी उछले थे. कमोबेश आज भी मुद्दे वैसे ही हैं . तर्क़ भी वही हैं.

ब्लोगवाणी या अन्य कोई भी सेवा या व्यापार ( जाकी रही भावना जैसी...) के इरादे से आता है तो उसका स्वागत होना चाहिये. यदि किसी के योगदन से हिन्दी को, या हिन्दी चिट्ठाकारी ( ब्लोगिंग) को लाभ पहुंचता है तो हमें शुद्ध अंत:करण से उसकी सराहना करना चाहिये.

कमियां हों तो बताना भी चाहिये. किसी को बुरा भी लगना नहीं चाहिये. लोकतंत्र में हर कोई कुछ भी कहने को स्वतंत्र है.
बात दिल पे नहीं लेनी चाहिये.

'पसन्द' को लेकर उठे प्रश्न ज़ायज़ हैं . ब्लोगवाणी को बुरा नहीं मानना चाहिये था. बस अपना स्पष्टीकरण दे देते. काफी होता . प्रश्नकर्ता की शंका भी मिट जाती.

लगता है कि ब्लोगवाणी ने इसे 'इमोशनलात्मक'बना दिया है.
आइये मैथिली जी व सिरिल जी को हम सब मनायें और ब्लोगवाणी को दुबारा चालू करवाने का प्रयास करें

Monday, 21 September 2009

जे काम का तुम्हारो बाप करैगो ?

मुश्किल जी है कि अब हर आदमी अपनी अपनी जिम्मेदारियन से बचवें चाहतै. लोग-बाग जी चाहन लगे हैं कि बैठे -बिठाये सबई कछू मिल जाय, काम -काज धेला भर कौ नायं करवें परै.

कोई कोई तो ऐसेऊ आलसी दिखाई परत हैं कि बैठे बैठे इंतज़ार कर रये हैं कि कोऊ आवे और कौर म्हों में डार दे.
हर कोऊ मुफत की ही खानो चाह रहो है.
अब जी नीचे वारी तस्वीर देखौ ज़रा. जो आदमी सडक पे लाइन खींच रहो,वाने देखौ कि एक टूटी भई डाल व्हन पे डरी है. अब कौन हिलाय वाकों?
तो इननें तरकीब का निकारी , देखो ज़रा -




मूल सामग्री साभार : चित्र - सुरेश बाबू , पोस्ट- जाने भी दो यारो!

Sunday, 20 September 2009

आखिर नटवरलाल कहां नहीं हैं ?

यदि किसी को भी ऐसा शुभचिंतक मिल जाये जो दुनिया में मशहूर स्थलों की सैर के लिये पूरे खर्चे के साथ घुमाने के लिये तैयार हो जाये तो आखिर कौन तैयार नहीं हो जायेगा ?
दुनिया भर में ऐसे कई नटवर लाल फैले हुए हैं जो किसी को भी कहीं भी अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस के नाम पर बुलावा दे रहे हैं. इन सारी अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस के मुद्दे भी सही मायनों में अंतर्राष्ट्रीय होते हैं - जैसे-गरीबी, बेरोज़गारी, भुखमरी, हिंसा, मानवाधिकार आदि आदि. इसी तरह की कांफ्रेंस दिसम्बर के पहले सप्ताह में कनाडा व अफ्रिका में होने वाली है. पहली अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस में मुद्दा है बेरोज़गारी जो 1 से 4 दिसम्बर तक बताई गयी है.दूसरी कांफ्रेंस पश्चिम अफ्रीका में 7 से 11 दिसम्बर तक होगी. मज़े की बात है कि कांफ्रेंस के आयोजक सारी ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार हैं . आने जाने का खर्चा भी और कांफ्रेंस के दौरान खाना-पीना रहना सब उनके जिम्मे. उनका दावा है कि प्रायोजकगण मिलकर सारे अतिथियों का खर्चा उठाने में सक्षम हैं.
सिर्फ आमंत्रित व्यक्ति ही नही वरन आयोजक तो तीन से लेकर दस साथियों को साथ लाने को भी कह रहे हैं.

नहीं यह अप्रैल फूल नहीं है. ऐसा एक आमंत्रण मुझे ई-मेल से प्राप्त हुआ है और सूचना है कि मेरा पता आयोजकों को देश के किसी युवा संगठन ने भेजा है.

पिछले छह महीने में इस प्रकार की अलग अलग विषयों /मुद्दों पर अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस हो रही हैं ऐसा मुझे इन छह महीनों में प्राप्त आमंत्रणों से पता चला है.

कहने की आवश्यकता नहीं है कि मैं अभी तक ऐसे सारे मुफ्त सैर सपाटा वाले आमंत्रणों को रद्दी की टोकरी के हवाले करता आ रहा हूं. पूरी दुनिया में शायद ही ऐसा कोई दरिया दिल संगठन होगा जो इस प्रकार से अंतर्राष्ट्रीय कांफ्रेंस आयोजित करके सभी जाने- अंजाने लोगों को ( मुझे भी )यार-दोस्तों के साथ इस तरह बुलायेगा.
ज़ाहिर है कि इसमें बड़ी चाल है .

कहीं आपको और आपके इष्ट मित्रों को तो इस तरह के प्रलोभन वाले आमंत्रण नहीं मिले हैं? मेरी तो राय कि इन पर बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया जाये.


आखिर नटवरलाल कहां नहीं हैं ?

Monday, 14 September 2009

कौवा जब बोले तब 'कांव'

बृजभाषा की एक कहावत है कि कौवा जब बोले तब 'कांव'. कौवे को प्रकृति ने 'कांव' बोलने के लिये ही तो बनाया है. कौवे से आप मधुर स्वर की अपेक्षा करे भी तो क्यों? अत: यदि आप बार बार कौवे के श्रीमुख से 'कांव कांव' ही सुन रहे हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये. बल्कि आश्चर्य तो तब हो जब कौवा 'कांव कांव' न बोलकर कुछ और बोले .

कुछ लोगों ने कसम खा रखी है कि वे नहीं सुधरेंगे. चर्चा में बने रहने के लिये राज ठाकरे जैसे (कथित) नेता ऊल-जलूल वक्तव्य देने से बाज़ नहीं आ रहे हैं.
चिट्ठानामाके अनुसार एक बार फिर राज ठाकरे ने ज़हर उगला है और उत्तर भारतीयों से कहा कि वे बम्बई की राजनीति में हस्तक्षेप न करें और अपने आप को सिर्फ पानी-पूरी बेचने तक सीमित रखें.

कोई इस शख्स को समझाये कि ये दादागीरी की ज़ुबान न ही बोले तो श्रेयस्कर होगा. जब भी वह अदालत के समक्ष उपस्थित होते हैं तो माफी की मुद्रा में दिखायी देते हैं. फिर जब भी मीडिया उन्हे भूलने लगता है तब फिर वह कुछ अटपटा बयान देकर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते हैं. अब जबकि बम्बई समेत पूरे महाराष्ट्र में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं तो ज़ाहिर है ऐसे में छुटभैये नेता फिर माहौल को गरमा कर अपने पक्ष में करने का प्रयास करेंगे.

जिन के विरुद्ध वह ज़हर उगल रहे हैं ,यदि वह भी ऐसी ही भाषा बोलने लगें तो क्या होगा? उत्तर भारतीयों के प्रति जिस प्रकार का दुर्व्यवहार बम्बई में हुआ है ,यदि उत्तर भारतीय भी बदला लेने पर उतर आयें तो क्या होगा ठाकरे जी? में ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह राज जैसे सिरफिरे व गुमराह व्यक्तियों को सद्बुद्धि प्रदान करे.

बस दो दुमदार दोहे इस विषय पर प्रस्तुत हैं:-

बिल्ली छोटे गांव की खुद को समझे शेर,
सवा सेर आ जायेगा, हो जायेगी ढेर.
कि सुन ले राज ठाकरे
मत अपनी जड़ें काट रे.


बम्बई तो जागीर है भारत भर की आज,
उल्टी गंगा मत बहा मूर्खों के सरताज.
बडा पछताना होगा
बड़े घर जाना होगा.

इसे यहां भी पढें

Saturday, 5 September 2009

विज्ञापन का पैसा हज़म ,तो फिर खेल खतम?




यह सही है कि अंग्रेज़ी समाचार पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में हिन्दी भाषा के (दैनिक) समाचार पत्रों को मिलने वाले विज्ञापन कुछ कम होते हैं. अक्सर कहा यह जाता है कि हिन्दी पढ़ने वालों की आय व क्रय- क्षमता अंग्रेज़ी भाषा पढ़ने वालों की अपेक्षा कम होती है. वैसे तो यह अलग विवाद का विषय है, अत: इस पर चर्चा फिर कभी. फिलहाल मुद्दआ यह है कि समाचारपत्रॉं का सम्पादकीय विभाग इतना सम्वेदनहीन क्यों है कि एक संस्थान से विज्ञापन का पैसा वसूल हुआ नहीं कि उसे भूल बैठे.

राजधानी के एक प्रमुख राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में 2 सितम्बर को छपा एक विज्ञापन जो गुरु दुर्बलनाथ जी के 148 वें जन्म दिवस समारोह से सम्बन्धित था.
अगले दिन इसी समाचारपत्र में उस समारोह की रपट भी प्रकाशित हुई, परंतु अब ज़रा उस रपट पर एक निगाह डालें. गुरु दुर्बल नाथ को बना दिया दुर्लभनाथ. प्रमुख संवाददाता की लापरवाही तो देखें कि पूरी रपट में दो बार गुरु जी को दुर्बलनाथ बताया गया है और दो बार दुर्लभनाथ.

इतना सब तब,जब एक दिन पहले ही संस्था से बड़े विज्ञापन की रकम भी डकारी जा चुकी थी. विज्ञापन का पैसा हज़म ,तो फिर खेल खतम?

Wednesday, 19 August 2009

लो जी हो गयी हिन्दी की चिन्दी !!


भले ही यह पहली बार नहीं है ( और यकीनन आखिरी बार भी).फिर भी एक बार देख कर अटपटा सा तो लगता ही है.
यदि कोई दुष्प्रयास को प्रयास कहे तो बात समझ में आती है किंतु यदि चेष्टा को चेस्टा कहने का प्रयास करे तो इसे क्या कहें.
और यदि 'दिनदहाड़े' यह चेस्टा हो तो ...?

( फोटो देखकर अब पूरी बात समझ में आ गयी ना ?)

जी हां, यह 'हिन्दुस्तान' है. हिन्दी का हिन्दुस्तान . हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान ..
अब आगे क्या कहा जाये .

Sunday, 4 January 2009

अब होगी ब्रज में रस-वर्षा

11 अप्रेल 2008 के बाद आज वापस आया हूं इस ब्लोग पर.
अनेक कारणों से समय निकालने में असमर्थ रहा. जब यह ब्लोग प्रारम्भ किया था, तब उद्देश्य था कि ब्रज भाषा व संस्कृति से सम्बंधित सामग्री को इस ब्लोग पर प्रस्तुत करूंगा.
हालांकि लगभग नौ माह हो गये ,मुझे अपने इस ब्लोग पर लिखे हुए( अपने दूसरे ब्लोग-भारतीयम पर भी बस अभी ही दुबारा शुरुआत की है).

इस बीच बहुत सी सामग्री एकत्र करता रहा (विशेषकर ब्रज भाषा की सामग्री एकत्र की है.)

अब लगातार कुछ न कुछ पठनीय सामग्री अवश्य प्रस्तुत करूंगा.
शीघ्र ही ... देखते रहें..

Friday, 11 April 2008

क्या आप दिल पे हाथ रख कर कसम खाते हैं?

सोचते समय कुछ लोग दिल से काम लेते हैं और कुछ दिमाग से.
बात जब 'इमोशनलात्मक' हो जाये ,तो ज़ाहिर है कि 'दिल का मामला है'
ज्ञानी धानी लोग कम अनुभव वालों को सीख दिया करते है कि 'दिल पे मत ले यार'.
'अगर दिल हमारा शीशे के बदले पत्थर का होता' तो हम कई ऐसी बातें भी हज़म कर जाते तो हमारे दिल को चोट पहुंचाती हैं.

हां, तो ये तो थी सिर्फ भूमिका. मुख्य प्रश्न यह है कि दिल चीज़ क्या है ?
कहां होता है दिल ?
क्या सबका दिल एक ही जगह पर होता है?
ज़ाहिर है कि इन सभी सवालों का एक ही ज़वाब है कि दिल तो आखिर दिल ही होता है?
सभी का दिल छाती पर बांयी तरफ हो ता है.
इस पर इतना बावेला क्यों

अब आइये ज़रा इस फोटो पर गौर करें,पहचान? रहे हैं ना ?

देखा ? इनका दिल कहां है?




Friday, 21 March 2008

बृज की एक और होरी

मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे
हे थई थई खेलें सांवरे
हां थई थई खेलें सांवरे
थई थई खेलें सांवरे,
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.


अरे कैसे आवें ग्वालिनें, अरे कैसे आवें ग्वालिनें ?
और कैसें आवें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे

अरे नाचत आवें ग्वालिनें, अरे नाचत आवें ग्वालिनें ?
और गावत आवें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.

अरे कहां से आवें ग्वालिनें, अरे कहां को जावें ग्वालिनें ?
और कहां से आवें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे

अरे मथुरा से आवें ग्वालिनें, अरे मथुरा से आवें ग्वालिनें ?
और गोकुल जावें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.


अरे का करती हैं ग्वालिनें, अरे का करती हैं ग्वालिनें ?
और का करते हैं ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे

अरे गऊ चरावें ग्वालिनें, अरे गऊ चरावें ग्वालिनें ?
और माखन खावें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.

होली की एक शाम यानी बृज की होरी

शाम हुई और मन हुरियारा हो गया.
फागुन की हवा में ही कुछ ऐसी मस्ती होती है
कि मन करता है कुछ रंगीन्,
कुछ चुलबुली शरारत ,
कुछ छेडछाड़ की जाये

किसी की चुनरी भिगोई जाये
किसी को चिकोटी काटी जाये.
किसी से चुहल की जाये.
और कुछ नहीं
तो बस मस्ती में अकेले ही झूम लिया जाये
.......
.....

और बस यूं ही कुछ पुरानी होली याद आयी ....ऐसे ...


कमल फूल जल में बाढे, और चन्दाआआआ हो उगे आकाश,
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हहो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?

कोजा बसे गढ आगरें, और कोजा औरंगाबाद
कोजा बसे गढ सांकरे और कोजा चन्दन चौपार
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?


देवरा बसे गढ आगरें, और जेठा औरंगाबाद
ससुर बसे गढ सांकरे और बलमा चन्दन चौपार
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?

पंगेबाजी पर प्रतिबन्ध

हर कोई होली पर हुरिया जाता है. बडा हो या छोटा. खरा हो या खोटा ( खोता भी). दुबला हो या मोटा. घोटालेबाज हो या पंगेबाज. बस दूसरों की "की मत " पर मौज़ां ही मौज़ां लेना चाहता है.
समीर हो जाते हैं समीरा. वह रेड्डी- (या ready) हैं या नहीं ,ये तो खुद ही बतायेंगे .
par guru janataa to bharmaa hee jaatee hai naa!!!!

हम कहते है, पंगे लो, ज़रूर लो, पर यह सोच के मत लो कि लेना है.

पंगों का तो यूं होना चाहिये कि लिया लिया, ना लिया नालिया. ( वाह! वाह!! तालिया, तालिया).

पंगे लो, पर बता के मत लो कि ले रहे हैं ( छुप छुप के ले लो ना, बिना बताये)





देखो भैया जी, , हम थोडा बहुत हुरिया गये थे, इसलिये ये सब बकवास लिख मारी है.
पढो, पढो, ना पढो, तो ना पढो

घर हो या ससुराल, मजे लो होली में.

नाचो दे दे ताल ,मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.


रंग -बिरंगे चेहरों में ढूंढो धन्नो,
घर हो या ससुराल, मजे लो होली में.


हुस्न एक के चार नज़र आयें देखो,
ऐनक करें कमाल,मजे लो होली में.


ऐश्वर्य जब तुम्हे पुकारे "अंकल जी"
छू कर देखो गाल, मजे लो होली में.

लड्डू पेडे गूझे,गुझिया,माल पुआ,
खाओ सब तर -माल मजे लो होली में.

मिले रंग में भंग, मज़ा तब लो दूना,
बहकी बहकी चाल, मजे लो होली में.

बीबी बोले मेरे संग खेलो होली,
बैठो सड्डे नाल मजे लो होली में.



नाचो दे दे ताल ,मजे लो होली में,
गालों मलो गुलाल, मजे लो होली में.