बृजभाषा की एक कहावत है कि कौवा जब बोले तब 'कांव'. कौवे को प्रकृति ने 'कांव' बोलने के लिये ही तो बनाया है. कौवे से आप मधुर स्वर की अपेक्षा करे भी तो क्यों? अत: यदि आप बार बार कौवे के श्रीमुख से 'कांव कांव' ही सुन रहे हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये. बल्कि आश्चर्य तो तब हो जब कौवा 'कांव कांव' न बोलकर कुछ और बोले .
कुछ लोगों ने कसम खा रखी है कि वे नहीं सुधरेंगे. चर्चा में बने रहने के लिये राज ठाकरे जैसे (कथित) नेता ऊल-जलूल वक्तव्य देने से बाज़ नहीं आ रहे हैं.
चिट्ठानामाके अनुसार एक बार फिर राज ठाकरे ने ज़हर उगला है और उत्तर भारतीयों से कहा कि वे बम्बई की राजनीति में हस्तक्षेप न करें और अपने आप को सिर्फ पानी-पूरी बेचने तक सीमित रखें.
कोई इस शख्स को समझाये कि ये दादागीरी की ज़ुबान न ही बोले तो श्रेयस्कर होगा. जब भी वह अदालत के समक्ष उपस्थित होते हैं तो माफी की मुद्रा में दिखायी देते हैं. फिर जब भी मीडिया उन्हे भूलने लगता है तब फिर वह कुछ अटपटा बयान देकर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते हैं. अब जबकि बम्बई समेत पूरे महाराष्ट्र में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं तो ज़ाहिर है ऐसे में छुटभैये नेता फिर माहौल को गरमा कर अपने पक्ष में करने का प्रयास करेंगे.
जिन के विरुद्ध वह ज़हर उगल रहे हैं ,यदि वह भी ऐसी ही भाषा बोलने लगें तो क्या होगा? उत्तर भारतीयों के प्रति जिस प्रकार का दुर्व्यवहार बम्बई में हुआ है ,यदि उत्तर भारतीय भी बदला लेने पर उतर आयें तो क्या होगा ठाकरे जी? में ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह राज जैसे सिरफिरे व गुमराह व्यक्तियों को सद्बुद्धि प्रदान करे.
बस दो दुमदार दोहे इस विषय पर प्रस्तुत हैं:-
बिल्ली छोटे गांव की खुद को समझे शेर,
सवा सेर आ जायेगा, हो जायेगी ढेर.
कि सुन ले राज ठाकरे
मत अपनी जड़ें काट रे.
बम्बई तो जागीर है भारत भर की आज,
उल्टी गंगा मत बहा मूर्खों के सरताज.
बडा पछताना होगा
बड़े घर जाना होगा.
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Monday, 14 September 2009
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