Monday, 14 September 2009

कौवा जब बोले तब 'कांव'

बृजभाषा की एक कहावत है कि कौवा जब बोले तब 'कांव'. कौवे को प्रकृति ने 'कांव' बोलने के लिये ही तो बनाया है. कौवे से आप मधुर स्वर की अपेक्षा करे भी तो क्यों? अत: यदि आप बार बार कौवे के श्रीमुख से 'कांव कांव' ही सुन रहे हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिये. बल्कि आश्चर्य तो तब हो जब कौवा 'कांव कांव' न बोलकर कुछ और बोले .

कुछ लोगों ने कसम खा रखी है कि वे नहीं सुधरेंगे. चर्चा में बने रहने के लिये राज ठाकरे जैसे (कथित) नेता ऊल-जलूल वक्तव्य देने से बाज़ नहीं आ रहे हैं.
चिट्ठानामाके अनुसार एक बार फिर राज ठाकरे ने ज़हर उगला है और उत्तर भारतीयों से कहा कि वे बम्बई की राजनीति में हस्तक्षेप न करें और अपने आप को सिर्फ पानी-पूरी बेचने तक सीमित रखें.

कोई इस शख्स को समझाये कि ये दादागीरी की ज़ुबान न ही बोले तो श्रेयस्कर होगा. जब भी वह अदालत के समक्ष उपस्थित होते हैं तो माफी की मुद्रा में दिखायी देते हैं. फिर जब भी मीडिया उन्हे भूलने लगता है तब फिर वह कुछ अटपटा बयान देकर मीडिया का ध्यान आकर्षित करने का प्रयास करते हैं. अब जबकि बम्बई समेत पूरे महाराष्ट्र में विधान सभा के चुनाव होने वाले हैं तो ज़ाहिर है ऐसे में छुटभैये नेता फिर माहौल को गरमा कर अपने पक्ष में करने का प्रयास करेंगे.

जिन के विरुद्ध वह ज़हर उगल रहे हैं ,यदि वह भी ऐसी ही भाषा बोलने लगें तो क्या होगा? उत्तर भारतीयों के प्रति जिस प्रकार का दुर्व्यवहार बम्बई में हुआ है ,यदि उत्तर भारतीय भी बदला लेने पर उतर आयें तो क्या होगा ठाकरे जी? में ईश्वर से प्रार्थना करता हूं कि वह राज जैसे सिरफिरे व गुमराह व्यक्तियों को सद्बुद्धि प्रदान करे.

बस दो दुमदार दोहे इस विषय पर प्रस्तुत हैं:-

बिल्ली छोटे गांव की खुद को समझे शेर,
सवा सेर आ जायेगा, हो जायेगी ढेर.
कि सुन ले राज ठाकरे
मत अपनी जड़ें काट रे.


बम्बई तो जागीर है भारत भर की आज,
उल्टी गंगा मत बहा मूर्खों के सरताज.
बडा पछताना होगा
बड़े घर जाना होगा.

इसे यहां भी पढें

Saturday, 5 September 2009

विज्ञापन का पैसा हज़म ,तो फिर खेल खतम?




यह सही है कि अंग्रेज़ी समाचार पत्र-पत्रिकाओं की तुलना में हिन्दी भाषा के (दैनिक) समाचार पत्रों को मिलने वाले विज्ञापन कुछ कम होते हैं. अक्सर कहा यह जाता है कि हिन्दी पढ़ने वालों की आय व क्रय- क्षमता अंग्रेज़ी भाषा पढ़ने वालों की अपेक्षा कम होती है. वैसे तो यह अलग विवाद का विषय है, अत: इस पर चर्चा फिर कभी. फिलहाल मुद्दआ यह है कि समाचारपत्रॉं का सम्पादकीय विभाग इतना सम्वेदनहीन क्यों है कि एक संस्थान से विज्ञापन का पैसा वसूल हुआ नहीं कि उसे भूल बैठे.

राजधानी के एक प्रमुख राष्ट्रीय हिन्दी दैनिक में 2 सितम्बर को छपा एक विज्ञापन जो गुरु दुर्बलनाथ जी के 148 वें जन्म दिवस समारोह से सम्बन्धित था.
अगले दिन इसी समाचारपत्र में उस समारोह की रपट भी प्रकाशित हुई, परंतु अब ज़रा उस रपट पर एक निगाह डालें. गुरु दुर्बल नाथ को बना दिया दुर्लभनाथ. प्रमुख संवाददाता की लापरवाही तो देखें कि पूरी रपट में दो बार गुरु जी को दुर्बलनाथ बताया गया है और दो बार दुर्लभनाथ.

इतना सब तब,जब एक दिन पहले ही संस्था से बड़े विज्ञापन की रकम भी डकारी जा चुकी थी. विज्ञापन का पैसा हज़म ,तो फिर खेल खतम?

Wednesday, 19 August 2009

लो जी हो गयी हिन्दी की चिन्दी !!


भले ही यह पहली बार नहीं है ( और यकीनन आखिरी बार भी).फिर भी एक बार देख कर अटपटा सा तो लगता ही है.
यदि कोई दुष्प्रयास को प्रयास कहे तो बात समझ में आती है किंतु यदि चेष्टा को चेस्टा कहने का प्रयास करे तो इसे क्या कहें.
और यदि 'दिनदहाड़े' यह चेस्टा हो तो ...?

( फोटो देखकर अब पूरी बात समझ में आ गयी ना ?)

जी हां, यह 'हिन्दुस्तान' है. हिन्दी का हिन्दुस्तान . हिन्दी दैनिक हिन्दुस्तान ..
अब आगे क्या कहा जाये .

Sunday, 4 January 2009

अब होगी ब्रज में रस-वर्षा

11 अप्रेल 2008 के बाद आज वापस आया हूं इस ब्लोग पर.
अनेक कारणों से समय निकालने में असमर्थ रहा. जब यह ब्लोग प्रारम्भ किया था, तब उद्देश्य था कि ब्रज भाषा व संस्कृति से सम्बंधित सामग्री को इस ब्लोग पर प्रस्तुत करूंगा.
हालांकि लगभग नौ माह हो गये ,मुझे अपने इस ब्लोग पर लिखे हुए( अपने दूसरे ब्लोग-भारतीयम पर भी बस अभी ही दुबारा शुरुआत की है).

इस बीच बहुत सी सामग्री एकत्र करता रहा (विशेषकर ब्रज भाषा की सामग्री एकत्र की है.)

अब लगातार कुछ न कुछ पठनीय सामग्री अवश्य प्रस्तुत करूंगा.
शीघ्र ही ... देखते रहें..

Friday, 11 April 2008

क्या आप दिल पे हाथ रख कर कसम खाते हैं?

सोचते समय कुछ लोग दिल से काम लेते हैं और कुछ दिमाग से.
बात जब 'इमोशनलात्मक' हो जाये ,तो ज़ाहिर है कि 'दिल का मामला है'
ज्ञानी धानी लोग कम अनुभव वालों को सीख दिया करते है कि 'दिल पे मत ले यार'.
'अगर दिल हमारा शीशे के बदले पत्थर का होता' तो हम कई ऐसी बातें भी हज़म कर जाते तो हमारे दिल को चोट पहुंचाती हैं.

हां, तो ये तो थी सिर्फ भूमिका. मुख्य प्रश्न यह है कि दिल चीज़ क्या है ?
कहां होता है दिल ?
क्या सबका दिल एक ही जगह पर होता है?
ज़ाहिर है कि इन सभी सवालों का एक ही ज़वाब है कि दिल तो आखिर दिल ही होता है?
सभी का दिल छाती पर बांयी तरफ हो ता है.
इस पर इतना बावेला क्यों

अब आइये ज़रा इस फोटो पर गौर करें,पहचान? रहे हैं ना ?

देखा ? इनका दिल कहां है?




Friday, 21 March 2008

बृज की एक और होरी

मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे
हे थई थई खेलें सांवरे
हां थई थई खेलें सांवरे
थई थई खेलें सांवरे,
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.


अरे कैसे आवें ग्वालिनें, अरे कैसे आवें ग्वालिनें ?
और कैसें आवें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे

अरे नाचत आवें ग्वालिनें, अरे नाचत आवें ग्वालिनें ?
और गावत आवें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.

अरे कहां से आवें ग्वालिनें, अरे कहां को जावें ग्वालिनें ?
और कहां से आवें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे

अरे मथुरा से आवें ग्वालिनें, अरे मथुरा से आवें ग्वालिनें ?
और गोकुल जावें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.


अरे का करती हैं ग्वालिनें, अरे का करती हैं ग्वालिनें ?
और का करते हैं ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे

अरे गऊ चरावें ग्वालिनें, अरे गऊ चरावें ग्वालिनें ?
और माखन खावें ग्वाल ?,नगर मे थई थई.....
मथुरा वृन्दावन बीच डगर मे थई थई खेलें सांवरे.

होली की एक शाम यानी बृज की होरी

शाम हुई और मन हुरियारा हो गया.
फागुन की हवा में ही कुछ ऐसी मस्ती होती है
कि मन करता है कुछ रंगीन्,
कुछ चुलबुली शरारत ,
कुछ छेडछाड़ की जाये

किसी की चुनरी भिगोई जाये
किसी को चिकोटी काटी जाये.
किसी से चुहल की जाये.
और कुछ नहीं
तो बस मस्ती में अकेले ही झूम लिया जाये
.......
.....

और बस यूं ही कुछ पुरानी होली याद आयी ....ऐसे ...


कमल फूल जल में बाढे, और चन्दाआआआ हो उगे आकाश,
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हहो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?

कोजा बसे गढ आगरें, और कोजा औरंगाबाद
कोजा बसे गढ सांकरे और कोजा चन्दन चौपार
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?


देवरा बसे गढ आगरें, और जेठा औरंगाबाद
ससुर बसे गढ सांकरे और बलमा चन्दन चौपार
मेरो मना पिउ में लागो
और पिउ को हो मोमें हतु नांय
पिउ बिन होरी को खेलै ?
हो पिउ बिन होरी को खेलै ?